पूर्वाग्रह और सिनेमा
जब भी आप या हम पूर्वाग्रह को समझने का प्रयास करेंगे तो इसे समाज के उस बंधन को प्रदर्शित कर पाएंगे जहां हमारे समाज में आज भी कहीं ना कहीं सिनेमा और चलचित्र के विषय को पाठ्यकर्म से दूर ही रखा जाता रहा।

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जब भी आप या हम पूर्वाग्रह को समझने का प्रयास करेंगे तो इसे समाज के उस बंधन को प्रदर्शित कर पाएंगे जहां हमारे समाज में आज भी कहीं ना कहीं सिनेमा और चलचित्र के विषय को पाठ्यकर्म से दूर ही रखा जाता रहा। जिसमें सिनेमा को मात्र मनोरंजन तक ही सीमित कर दिया गया और इन पूर्वाग्रहों की वजह से सिनेमा समाज व लोगो के मध्य सिर्फ और सिर्फ खाली समय में मनोरंजन का साधन मात्र रह गया। परंतु समय के साथ ही परिस्थितियां भी बदली और धीरे-धीरे सिनेमा की परिपाटी बदली। भारतीय सिनेमा की बात करें तो इसका पहला युग 1896-1930 को माना जाता है। यह युग मूक फिल्मो का युग था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रांस ने न्यू वेव सिनेमा की शुरूआत की। परन्तु यहाँ मैं विभिन्न युगों की बात नहीं कर रही, क्योंकि चाहे कितना भी याद कर लीजिए आप इतिहास को पढ़ कर उसमेें बोरियत ही पाएंगे क्योंकि इतिहास वो पाठ्यक्रम है जिससे युवा मजबूरन ही अपनाते है। खैर पूर्वाग्रह की बात करते है। 

आज सिनेमा लोगों का अभिन्न अंग बन चूका है परन्तु इसे आज भी कुछ क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा से दूर ही रखा जाता है उन लोगों का मानना है कि सिनेमा में कोई भविष्य नहीं, यह मात्र बच्चों को शिक्षा से भटकाता है! और प्राय: ये देखा गया गया है कि मध्य परिवार में बच्चों को सिनेमा देखने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। लेकिन वास्तव में सिनेमा हमारे समाज के उन विषयों को चलचित्र के माध्यम से लोगों के मध्य व्याप्त तथ्यों को प्रदर्शित करता है। और मनोरंजन ही एकमात्र वह साधन है जो बिना बोरियत को ज्ञान देता है।

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