जानलेवा बीमारी – बिहार में बच्चों की मौत
बिहार में अभी तक एक सौ पचीस से अधिक बच्चों की मौत हो गई है | बीमारी के कारणों का सही ढंग से पता नहीं चल पाया है | कुछ डाक्टर इसे एक्यूट इन्सेप्लाईटीस सिन्ड्रोम तो कुछ इसका कारण “लू” बताते हैं | कुछ को कोई कारण का पता हीं नहीं चल पा रहा है | लक्षणों के आधार पर साधारण भाषा में इसे चमकी बुखार मानकर सही इलाज नहीं कर पा रहे हैं |

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बिहार में अभी तक एक सौ पचीस से अधिक बच्चों की मौत हो गई है | बीमारी के कारणों का सही ढंग से पता नहीं चल पाया है | कुछ डाक्टर इसे एक्यूट इन्सेप्लाईटीस सिन्ड्रोम तो कुछ इसका कारण “लू” बताते हैं | कुछ को कोई कारण का पता हीं नहीं चल पा रहा है | लक्षणों के आधार पर साधारण भाषा में इसे चमकी बुखार मानकर सही इलाज नहीं कर पा रहे हैं | कुछ लोगों का मानना है कि लीची खाने से बच्चे बीमार हो रहे हैं | बीमारी का नाम जो भी सही हो , एक लक्षण तो कोमन है – बुखार, जो रोग के प्रारम्भ से बना रहता है और अंत में अन्य लक्षणों के साथ मृत्यु का कारण बनता है | अगर बुखार और बुखार के कारणों का कुछ भी अंश पता चल जाये तो कैजुअल्टी की दर घट सकती है |

सिस्टम ऑफ़ मेडिसीन भिन्न होने के कारण किसी भी रोग के कारणों की जाँच उस सिस्टम के मूलभूत सिद्धांत पर निर्भर करता है | एक्यूट रोग में एलोपैथिक सिस्टम में रोग का कारण बैक्टीरिया या वायरस का आक्रमण माना जाता है | होम्योपैथीक सिस्टम में एक्युट रोगों में लक्षणों के आधार पर दवा निर्धारित की जाती है और लक्षणों की तीव्रता एवं रोगी की जीवनशक्ति (vitality) पर गौर करते हुए दवा की पोटेंसी (क्षमता) का सलेक्शन कर रोगी को दिया जाता है जबकि क्रोनिक रोग में लक्षणों को सोरा सिफलिस या सायकोसिस के आलोक में बर्गीकृत कर दवा सेलेक्ट किया जाता है | सबसे मुख्य बात यह है कि होम्योपैथी में एक्यूट रोग (जोबिहार में फैला है) में भिन्न भिन्न रोगियों के लिये दवायें और उनकी पोटेंसी एक नहीं हो सकती है अर्थात दवायें भी अलग और अगर दवा एक होंगी तब दवा की पोटेंसी भी अलग हो सकती है |

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