चुनौतियाँ – प्रधानमंत्री मोदी ०२ के आगे
ब्रिटिश रूल से हमें १९४७ में आजादी मिली और रहने के लिये भारत के नाम से जो क्षेत्र चिन्हित किया गया वो हिंदु धर्म के नाम पर | “भारत की शासन व्यवस्था लोकतान्त्रिक होगी” का अधिकारिक स्वरूप १९५० में सुनिश्चित किया गया | तत्कालीन आजादी के नेताओं की मानसिकता में गुलामी की खुमारी ने आजाद देश के धर्म के बारे में सोचने से रोक दिया |

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ब्रिटिश रूल से हमें १९४७ में आजादी मिली और रहने के लिये भारत के नाम से जो क्षेत्र चिन्हित किया गया वो हिंदु धर्म के नाम पर | “भारत की शासन व्यवस्था लोकतान्त्रिक होगी” का अधिकारिक स्वरूप १९५० में सुनिश्चित किया गया | तत्कालीनआजादी के नेताओं की मानसिकता में गुलामी की खुमारी ने आजाद देश के धर्म के बारे में सोचने से रोक दिया | खासकर हिंदु धर्म के नाम से हीं चिढ़ रहने के कारण इस शब्द को संविधान में जगह तक नहीं दी गई, देशधर्म तो दूर की बात थी | हिंदु - इस्लाम मिश्रित देश का संवैधानिक धर्म नहीं बन सकता था | इस्लाम के आधार पर हमारी आजादी के एक दिन पहले हीं हिंदुस्तान के एक निश्चित भूभाग को अलग कर मुसलमानों के लिए ब्रिटिश शासकों ने पाकिस्तान नाम से दूसरा देश बना दिया था | धर्म के आधार पर इस बँटवारे में हमारे नेताओं की स्वीकृति थी | उहापोह की स्थिति में भारत को धर्म निरपेक्ष घोषित किया गया जहाँ देश का कोई धर्म नहीं होता है और सभी धर्मों को एक जैसी संवैधानिक मान्यता मिलती है | सभी धर्मावलम्वी एक जैसे नागरिक होते हैं | लेकिन १९५० के दशक (१९५५ – ५६) में प्रथम लोकत्रांतिक कॉंग्रेस सरकार के प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने समान नागरिक संहिता की आड़ में हिंदु कोड बील पास कर हिंदु धर्म के पर्सनल लौ को समाप्त  कर दिया | बदलते परिवेश में संस्कृति एवं संस्कारों की विशेषताओं को अनुचित करार देने की प्रवृति के बढ़ने के साथ उसे ढोंग की संज्ञा दी जाने लगी | इस्लामएवं अन्य धर्म के लोगों को इन कानूनों से छुट थी और वे अपने पर्सनल लौ के आधार पर चल रहे थे | इस तरह आजाद भारत में प्रभेद की परम्परा की शुरुआत नेहरू ने अपने प्रधानमंत्रीत्व कार्यकाल के प्रथम पंचवर्षीय सत्र में हीं कर चुके थे |

आजादी से पहले हिंदुस्तान का बँटवारा पाकिस्तान और भारत के रूप में हुआ | आजादी के बाद भी भारत का बँटवारा हुआ | परन्तु यह बँटवारा आंतरिक एवं आंतरिक प्रशासन के लिए हुआ | राज्य पुनर्गठन एक्ट १९५६ से तत्कालीन बँटवारे का मुख्य आधार बना भाषा | राज्यों की सीमाओं का निर्धारण नदी, नाले, पहाड़ या जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि एक और सिर्फ एक भाषा बोले जाने वाले क्षेत्र का सीमांकन कर राज्यों का गठन किया गया | उदाहरण के लिये केरल मलयालम, तमिलनाडु तमिल, आंध्र तेलगू, कर्णाटक कन्नड़, महाराष्ट्र मराठी, गुजरात गुजराती, हरियाणा हरियाणवी, प. बंगाल बंगाली, उड़ीसा ओड़िया, आसाम आसामी तथा अन्य राज्यों में हिंदी को स्वीकार करते हुए सीमांकन किया गया | आजादी के 70 वर्ष हो गये | राजनीतिक स्तर पर हम सभी बराबर हैं और भारतीय नागरिक हैं | मगर जब कभी भाषायी विवाद उत्पन्न होता है तो सामाजिक संतुलन ताड़ ताड़ होने लगता है | दृष्टान्त हैं: “महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों के लिए” का आन्दोलन कई वार उग्र होते देखा गया है | असम असमियों के लिए का मुद्दा भी मुखर होते देखा गया है | अन्य राज्यों में भी कभी कभी छोटी मोटी समस्याएं होती रहती है | इन कारणों से राज्य के बाहरी लोगों का पलायन भी होता रहा है भले हीं कुछ अवधि के लिए हीं क्यों न हुआ हो | प. बंगाल से पलायन की खबर तो नहीं आई है मगर वहां कुछ खास है जो कहीं देखने या सुनने को नहीं मिलेगा | वहां के लोग अपने को बंगाली कहते हैं और दुसरे राज्य के लोगों को हिदुस्तानी बोलते हैं | उनकी नजरों में हिन्दुस्तानी का मतलब होता है “अनपढ़ गवाँर” | ये बंगालियों की अपनी सोच है | प. बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक बयान ने थोड़ा सकते में लाकर रख दिया है | अभी हाल में जूनियर डाक्टरों की हड़ताल के दौरान ममता जी ने कहा “बंगाल में बंगला बोलो” | हड़ताल अवधि में  उनके इस बयान के कई मायने हो सकते हैं | उस समय उनकी काफी फजीहत हुई थी | मेट्रो सिटीज खास कर जब आप (किसी भी जगह के हों) दिल्ली जायेंगे और आपकी जीवन या कार्यशैली में ढीला ढालापन दिख गया तो आप बिहारी से संबोधित किये जायेंगे | हाल में ही सेकेण्डरी स्तर की पढाई में द्वितीय भाषा हिंदी को लेकर काफी विवाद हो गया | तमिल भाषियों के विरोध ने उस प्रस्ताव को वापस लेने के बाध्य कर दिया |

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