उम्मीदों की गर्मी छुट्टी
इस बार की गर्मी छुट्टी के लिए मैं और मेरी बेटी काफ़ी उत्साहित थी। हमने कितने ही तरह-तरह के प्रोग्राम बना लिया था। ससुराल में शादी थी जिस कारण हम ससुराल में आधा छुट्टी मनाएंगे वहां की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के बाद।

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इस बार की गर्मी छुट्टी के लिए मैं और मेरी बेटी काफ़ी उत्साहित थी। हमने कितने ही तरह-तरह के प्रोग्राम बना लिया था। ससुराल में शादी थी जिस कारण हम ससुराल में आधा छुट्टी मनाएंगे वहां की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के बाद। आज दस साल पर बिना किसी शर्त के हम माँ के यहां जाके अपने भाई बहनों और उनके  बच्चों के साथ पूरे दस दिन रहने वाले थे। ऐसा नहीं था कि मैं मायके कभी गयी नहीं हमेशा ही जाती थी लेकिन कभी खुशी अथवा आज़ादी से रह नहीं पाती थी कभी एक घंटे के लिए तो कभी एक दिन के लिए। अगर किसी बार दो दिन से अधिक रह भी गई तो दुःखी मन से ही रही थी। क्यूंकि इनको दिक्कतें होती थी अकेले य़ह काम और घर दोनो नहीं सम्भाल पाते थे। इसलिए कभी अकेले जाने अथवा रहने की सोची भी नहीं थी।

इस बार इनका भी मन था। छुट्टी से पहले ही तय हो गया था कि तुम दोनों इस बार माँ पापा के पास दस दिन रह लेना जिससे उनको भी थोड़ा अच्छा लगेगा और बच्चे भी खुश हो जाएंगे। मैंने मायके के हिसाब से हम माँ बच्चों की पैकिंग की। खुशी का ठिकाना नहीं था अपने भाई बहनों से भी आने और रहने की बातें बताया अथवा उनकों भी आने के लिए कहा। और सब कितने ही दिनों के बाद एक साथ मिलकर क्या क्या करना है सोचने लगे और मन ही मन खुश होने लगे। हमारे आने और रहने की बात से माँ पापा खुश थे और नाती नातिन के साथ समय व्यतीत करने का मौक़ा मिलेगा। इस खुशी में वे तो अपनी सारी बीमारियों और तकलीफ़ों को मानो भूल ही गए थे।

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