आज़म खान अपने पूर्वजों की गलती सुधारें !
आज़म खान भारतीय संसद के सम्मानित सदस्य हैं | उन्होंने १९ जुलाई २०१९ को संसद भवन के परिसर में मिडिया के सबालों के जवाब में कहा कि १९४७ में उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान नहीं जा कर भारत में हीं रहने की बड़ी भूल कर दी | इसका खामियाजा उन्हें आज भुगतना पड़ रहा है |

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आज़म खान भारतीय संसद के सम्मानित सदस्य हैं | उन्होंने १९ जुलाई २०१९ को संसद भवन के परिसर में मिडिया के सबालों के जवाब में कहा कि १९४७ में उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान नहीं जा कर भारत में हीं रहने की बड़ी भूल कर दी | इसका खामियाजा उन्हें आज भुगतना पड़ रहा है | एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वो क्या करेंगे पूर्वजों की गलती को भोगेंगे | यही बयान उनहोंने लगभग छ: महीने पहले अपने घर पर भी एक बार दिया था | आज़म खान खुद एक सांसद हैं | कुछ महीने बीते आम चुनाव में जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है | इतने लोगों का समर्थन उन्हें हासिल है | उनको अधिकार है वो कोई भी कानून बनाने या समाप्त करने के लिये बील ला सकते हैं संसद में बहस कर सकतें हैं | फिर समझ में नहीं आता कि वो इतने हतास एवं लाचार क्यों हो गये हैं | बार बार इस तरह का उनका बयान आना कई प्रकार की शंकायें पैदा करती हैं साथ ही समस्यायें भी खड़ीं कर सकती है |

उनकी यह सोच १९४७ में भारत पाकिस्तान के बँटवारे को सही ठहराता है तो दूसरी ओर उनकी मंशा भारत के एक और बँटवारे की तरफ ले जाती दिखती है | १९४७ के बँटवारे से भारत को दोहरी मार लगी | एक तो भारत की भूमि बंट गई और दूसरा जिस आधार को लेकर बँटवारा हुआ उस आधार को बँटवारे के बाद समाप्त हो जाना चाहिये था लेकिन आज़म खान और उनके सरीखे नेताओं की बदौलत वो जिन्दा रह गया | लोकतंत्र की रीढ़ कही जाने वाली आम जनता को अपना वोट बैंक बनाने वाले राजनीतिक दलों ने उसे सींचा और फूलने फलने के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार कर दिया | अंग्रेज शासकों की गंभीर साजिस का शिकार एवं वोट बैंक की नीतियों पर आधारित सरकार की नीतियों ने भारत में एक बार फिर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के नाम दो कभी नहीं मिलने वाले ध्रुव की स्थापना कर दी | आज़म खान का बयान इन दो ध्रुवों के बीच की दूरी को विस्तारित करता है |

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