अपराधिक मानसिकता ! अंतिम भाग |
अब जरा सोचें की उस आदमी को घर से अच्छा जेल हीं क्यों पसंद है | पचास साल के उस आदमी में यह मानसिकता कहाँ से और क्यूँ आयी | इतनी बात तो सच है कि पहली बार वह जो जेल गया उसके पीछे भी कोई अपराध ही कारण होगा | जमानत पर छूटने के बाद जब वो जेल से बाहर घर आया तब उसे एहसास हुआ कि उसके बाकी दिनों की जिन्दगी के लिए जेल ही घर से अच्छी जगह है |

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अब जरा सोचें की उस आदमी को घर से अच्छा जेल हीं क्यों पसंद है | पचास साल के उस आदमी में यह मानसिकता कहाँ से और क्यूँ आयी | इतनी बात तो सच है कि पहली बार वह जो जेल गया उसके पीछे भी कोई अपराध ही कारण होगा | जमानत पर छूटने के बाद जब वो जेल से बाहर घर आया तब उसे एहसास हुआ कि उसके बाकी दिनों की जिन्दगी के लिए जेल ही घर से अच्छी जगह है | कारण इसके कई हो सकते हैं | बाहर वो अपने को असुरक्षित महसूस करता हो क्योकि वो किसी अपराध में ही जमानत पर जेल से बाहर था | जमानत पर छूटने के बाद उसे खतरा महसूस हुआ हो इसलिये दूसरा अपराध कर जेल हीं जाना पसन्द किया | जेल में वह हर तरफ से सुरक्षित रहेगा,  ये सोच तो उसका सही था | मगर उसकी ये सोच पुलिस के सामने बाईक चोरी में पकडे जाने के बाद के उसके बयान को सिरे ख़ारिज करता है | अन्य पहलुयें भी हैं | परिवार वालों की उसके प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण या परिवार के प्रति उसकी उदासीनता भी एक कारण हो सकता है | यदि उसके जीवन की चर्चा बचपन से ही की जाए और वो भले परिवार से आता हो तो सम्भव है कि अपने तिरस्कार का बदला परिवार की प्रतिष्ठा  को दाँव पर लगाने के लिए बार बार छोटे अपराध कर रहा हो | यदि अपराध की कमाई ही उसके जीवन का आधार हो तो फिर समीक्षा बहुत आगे तक जा सकती है | मगर इस सोच में यहाँ दम नहीं है क्योंकि बाईक चोरी के सिलसिले में उसने खुद को गिरफ्तार करवा कर जेल लौटने की साजिस रची | पूर्व के अपराधों की जानकारी नहीं रहने के कारण उसकी मानसिकता का सटीक विश्लेषण कठिन है लेकिन अभी तक के सारे पहलुओं पर एक साथ विचार कर देखने से लगता है की वो अपने परिवार वालों से तिरस्कृत है | वो अपराधिक मानसिकता का नहीं हैं क्योंकि उसे कानून का डर है | जेल के बाहर लोग उस पर तंज कसते होंगे और वह असहज महसूस कर रहा होगा | जेल में वह इन सबसे मुक्त पाता होगा | इस तरह वो जेल में हीं रहना पसंद किया और इसलिए उसने बाईक की चोरी की |

रेप और हत्या करने वालों की जितनी भी भर्स्तना की जाय कम होगी | ऐसे अपराध करने वाले कड़ी से कड़ी सजा पाने के योग्य हैं चाहे वो किसी भी उम्र का क्यों न हो | पागल भी ऐसा काम नहीं कर सकता है | इसके लिये कानून में प्रावधान होना चाहिये और कोर्ट में मामले का त्वरित निष्पादन की व्यवस्था होनी चाहिये | इससे कानून के भय का वातावरण तैयार होगा | लोग ऐसे अपराध करने से पहले कई बार सोचेंगे | लेकिन क्या भय का वातावरण बन पायेगा और अपराध में कमी आयेगी | इसपर गंभीरता से विचार करना होगा | कानून तो पहले से है उस में संशोधन कर कड़े प्रावधान भी किये गये हैं | लेकिन सजा का दायरा बढ़ने के साथ ऐसे अपराधों की संख्यां बढ़ती हीं जा रही है | यह सरकार और समाज दोनों के लिये चिंता का विषय है | इनके कारणों पर भी विचार करना होगा तत्पश्चात अपराधिक मानसिकता स्वत: स्पष्ट हो जायेगी |

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